लोकदेवता · गौरक्षक · सत्यवादी
29 जनवरी 1074 — 28 अगस्त 1103 · खरनाल (नागौर) से सुरसुरा (अजमेर)
वीर तेजा — जिन्हें तेजाजी महाराज भी कहा जाता है — राजस्थान के लोकदेवता, योद्धा, समाज-सुधारक और गौ-रक्षक माने जाते हैं। ग्रामीण उत्तर राजस्थान में वे शिव के ग्यारह प्रमुख अवतारों में गिने जाते हैं। पूजा राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गुजरात तक फैली है। सर्प-दंश से रक्षा के लोकविश्वास के कारण उन्हें नागों के देवता और धौलिया वीर भी कहा जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार जन्म शुक्रवार, माघ शुक्ल 14, संवत 1130 (29 जनवरी 1074) को नागौर ज़िले के खरनाल में धौलिया गोत्र के जाट परिवार में हुआ। पिता चौधरी ताहड़ देव (ताहर), खिरनाल/खरनाल के मुखिया; माता राम कुँवारी। दोनों शिव-भक्त माने जाते हैं। लोककथा है कि माता को नागराज का वर मिला और पुत्र तेजा का जन्म हुआ। बहन का नाम राजल। घोड़ी का नाम लीलां। आयुध — भाला।
ज्येष्ठ की पहली वर्षा के बाद मुखिया को हल चलाने की परंपरा हलसोटिया कहलाती है। पिता और भाई गाँव से बाहर होने पर माता ने तेजा से यह कर्तव्य निभाने को कहा। तेजा ने खेत जोते — राज्य नहीं, खेत से शुरू होती वीरता।
हलसोटिया के दौरान भाभी खेत पर भोजन (छक) देर से ले आईं। ताने में पत्नी पेमल का नाम आया — पेमल अभी मायके में थीं। तेजा ने निश्चय किया कि पत्नी को ससुराल से ले आएँगे। पेमल की शर्त थी कि स्वागत में बहन राजल भी हों — अतः पहले राजल को लाना पड़ा।
बहन को लेने जाते हुए तेजा का सामना डाकुओं से हुआ। संघर्ष में विजय के बाद ताबीजी (अजमेर) पहुँचकर जीजा की अनुमति से राजल को खरनाल ले आए।
ससुराल पानेर (अजमेर) में सास गाय दुह रही थीं। लीलां घोड़ी पर अचानक प्रवेश से पशु बिदक गए। तेजा का विवाह पेमल से लगभग नौ माह की आयु में हुआ था, पेमल तब छह माह की थीं — पुष्कर घाट, पुष्कर पूर्णिमा 1074। सास उन्हें पहचान नहीं सकीं और गायें बिदकने पर शाप दिया कि काला नाग डसेगा। क्रोध में तेजा बिना पेमल के लौटने लगे। पेमल व्यथित हुईं। सहेली लाच्छा गुजरी ने पेमल की पीड़ा सुनाई। तेजा लाच्छा के घर रुके — यहीं पहली बार पेमल से साक्षात्कार हुआ।
बात चल रही थी कि लाच्छा ने बताया — चांग के मीणा उसकी सारी गायें हांक कर ले गए। तेजा अकेले लीलां पर सवार होकर पीछे पड़े। रास्ते में आग में जलते बासक नाग को बचाया। नाग ने डसने का शाप/इच्छा जताई। तेजा ने वचन दिया — गायें छुड़ाकर लौटूँगा, तब डस लेना। चांग घाटी (सुरसुरा से लगभग 15 किमी) में युद्ध हुआ। लोकगाथा कहती है कि सैकड़ों मीणा मारे गए और गायें लौटाई गईं।
गायें लौटाकर तेजा नाग के सामने प्रस्तुत हुए। शरीर पर घावों के कारण डसने योग्य स्थान नहीं मिला। तेजा ने जीभ आगे की। बासक नाग ने वर दिया कि कलियुग में देवता के रूप में पूजे जाएँगे। मृत्यु भाद्रपद शुक्ल दशमी, संवत 1160 — शनिवार 28 अगस्त 1103, आयु लगभग 29 वर्ष, स्थान सुरसुरा (अजमेर)। यही तिथि तेजा दशमी है। वचन के पुरुष के रूप में स्मरण — सर्पदंश पर मंदिर जाना लोकरीति है। गौ-रक्षा उनके जीवन का दूसरा स्तंभ है।
लोकस्मृति में पत्नी पेमल और बहन राजल का सती होना भी गाया जाता है — यह प्रथा आज त्याज्य है; गाथा को सत्य-वचन और गौसेवा के पाठ के रूप में पढ़ें, कुरीति के रूप में नहीं।
स्रोत सार: सार्वजनिक इतिहास व लोकगाथा — Veer Teja, Wikipedia (CC BY-SA)। तिथियाँ व विवरण लोक-इतिहास पर आधारित हैं।
जन्म: 29 जनवरी 1074, खरनाल, नागौर
गोत्र: धौलिया जाट
माता-पिता: राम कुँवारी · ताहड़ देव
जीवनसाथी: पेमल (पानेर)
घोड़ी: लीलां
बलिदान: 28 अगस्त 1103, सुरसुरा